हरि ॐ

सामवेद (Samved)

सामवेद 5.6.7

अध्याय 5 → खंड 6 → मंत्र 7 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

सामवेद (अध्याय 5)

सामवेद: | खंड: 6
अक्रान्त्समुद्रः प्रथमे विधर्मं जनयन्प्रजा भुवनस्य गोपाः । वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे स्वानो अद्रिः ॥ (७)
सोम जलमय हैं. वे यज्ञ के रक्षक, इच्छा पूरक और शक्तिवर्धक हैं. वे यजमानों को सब से ज्यादा उत्साह और उन्नति देने वाले हैं. (७)
Som is jealous. They are the protectors of yajna, will supplementation and strength giver. They are going to give the hosts the most enthusiasm and progress. (7)