यजुर्वेद (अध्याय 1)
अपा॒ररुं॑ पृथि॒व्यै दे॑व॒यज॑नाद्वध्यासं व्र॒जं ग॑च्छ गो॒ष्ठानं॒ वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्या श॒तेन॒ पाशै॒र्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्विष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क्। अर॑रो॒ दिवं॒ मा प॑प्तो द्र॒प्सस्ते॒ द्यां मा स्क॑न् व्र॒जं ग॑च्छ गो॒ष्ठानं॒ वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्या श॒तेन॒ पाशै॒र्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क् ॥ (२६)
हम ने दुष्ट अररु नामक शत्रु को पृथ्वी से दूर कर दिया है. मिदटी को निकाल कर जगह साफ कर दी है. अब उस मिट्टी से निवेदन करते हैं कि वह गायों के बाड़े में जाए. स्वर्गलोक पृथ्वी पर पर्याप्त बरसात करने की कृपा करे. सविता सिरजनहार हैं. वे हम से द्वेष करने वालों को सैकड़ों बंधनों से बांध दें और उन्हें कभी मुक्त न करें. (२६)
We have removed the evil enemy named Arru from the earth. The place has been cleared by removing the midti. Now we request that soil to go to the cows' enclosure. May heaven bless the earth with enough rain. Savita is the creator. Let them bind those who hate us with hundreds of bonds and never set them free. (26)