हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 1.30

अध्याय 1 → मंत्र 30 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
अदि॑त्यै॒ रास्ना॑सि॒ विष्णो॑र्वे॒ष्पोस्यू॒र्ज्जे त्वाऽद॑ब्धेन॒ त्वा॒ चक्षु॒षाव॑पश्यामि। अ॒ग्नेर्जि॒ह्वासि॑ सु॒हूर्दे॒वेभ्यो॒ धाम्ने॑ धाम्ने मे भव॒ यजु॑षे यजुषे ॥ (३०)
हे अदिति देव! आप रसमय, विष्णु के वास स्थल व ऊर्जस्वी हैं. हम कमल जैसे नेत्रों से बारबार आप को देखते हैं. आप अग्नि की जीभ, देवताओं के निवास स्थल व संत्र व्यापक हैं. हे यजमानो! आप धामधाम पर ऐसे देव को पुकारें व आमंत्रित करें. (३०)
O Aditi Dev! You are energetic as rasamaya, the abode of Vishnu. We see you again and again with eyes like lotus. You are the tongue of agni, the abode of the gods and the plant wide. O hosts! You call and invite such a god at Dhamdham. (30)