हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

अध्याय 12 के सभी मंत्र

यजुर्वेद अध्याय 12 के सभी मंत्र हिंदी अर्थ के साथ

यजुर्वेद (अध्याय 12)

यजुर्वेद:
दृ॒शा॒नो रु॒क्मऽउ॒र्व्या व्य॑द्यौद् दु॒र्मर्ष॒मायुः॑ श्रि॒ये रु॑चा॒नः। अ॒ग्निर॒मृतो॑ऽअभव॒द् वयो॑भि॒र्यदे॑नं॒ द्यौरज॑नयत् सु॒रेताः॑ ॥ (१)
सूर्य पूर्व दिशा में दृष्टिगोचर हो रहे हैं. उन की आज की दिनभर की आयु संघर्षपूर्ण है. वे शोभा के लिए प्रकाशित हो रहे हैं. यजमानों ने जब स्वर्गलोक से सूर्य को प्रकट किया तब इवि ग्रहण करने के लिए वे अग्निरूप में आ गए. (१)
The sun is visible in the east direction. His day-to-day life is struggling. They are being published for Shobha. When the hosts appeared to the sun from heaven, they came in the form of agni to receive the eclipse. (1)

यजुर्वेद (अध्याय 12)

यजुर्वेद:
नक्तो॒षासा॒ सम॑नसा॒ विरू॑पे धा॒पये॑ते॒ शिशु॒मेकं॑ꣳ समी॒ची। द्यावा॒क्षामा॑ रु॒क्मोऽअ॒न्तर्विभा॑ति दे॒वाऽअ॒ग्निं धा॑रयन् द्रविणो॒दाः ॥ (२)
सूर्य समान मन से सुवह और दिन की यात्रा करते हैं. एक दूसरे से बिलकुल अलग रूप वाले एक शिशु को ये देव उपयुक्त रीति से पोषित करते हैं. सूर्य स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के बीच चमकते हैं. बैसे ही धनदाता देवगण अग्नि को धारते हैं. (२)
The sun travels with the same mind and day. These gods suitably nourish a baby with a completely different form from each other. The sun shines between heaven and earth. That is why the wealth-giving devas hold the agni. (2)

यजुर्वेद (अध्याय 12)

यजुर्वेद:
विश्वा॑ रू॒पाणि॒ प्रति॑मुञ्चते क॒विः प्रासा॑वीद् भ॒द्रं द्वि॒पदे॒ चतु॑ष्पदे। वि नाक॑मख्यत् सवि॒ता वरे॒ण्योऽनु॑ प्र॒याण॑मु॒षसो॒ विरा॑जति ॥ (३)
सूर्य विश्व रूप व कवि हैं. वे दोपायों और चौपायों का कल्याण करते हैं. वे वरेण्य हैं. वे सभी को प्रेरित करते हैं. वे उषा देवी के जाने के बाद आकाश में शोभित होते हैं. (३)
Sun is the world form and poet. They do the welfare of two-legs and chaupayas. They are varnya. They inspire everyone. They adorn the sky after Usha Devi leaves. (3)

यजुर्वेद (अध्याय 12)

यजुर्वेद:
सु॒प॒र्णोऽसि ग॒रुत्माँ॑स्त्रि॒वृत्ते॒ शिरो॑ गाय॒त्रं चक्षु॑र्बृहद्रथन्त॒रे प॒क्षौ। स्तोम॑ऽआ॒त्मा छन्दा॒स्यङ्गा॑नि॒ यजू॑षि॒ नाम॑। साम॑ ते त॒नूर्वा॑मदे॒व्यं य॑ज्ञाय॒ज्ञियं॒ पुच्छं॒ धिष्ण्याः॑ श॒फाः। सु॒प॒र्णोऽसि ग॒रुत्मा॒न् दिवं॑ गच्छ॒ स्वः पत ॥ (४)
हे सविता देव! आप गरुड़ स्वरूप हैं. त्रिवृत्‌ स्तोम आप का सिर है. गायत्री छंद आप के नेत्र हैं. बृहत्साम और रथंतर साम आप के दोनों पंख हैं. पंचदश स्तोम आप की आत्ता हैं. छंद आप के अंग हैं. सब यजु आप के नाम हैं. साम आप का शरीर है. यज्ञायज्ञिय साम आप की पूंछ हैं. धिष्णियों में निहित अग्नि आप के पंख हैं. आप शुभ गतिवान हैं. आप स्वर्गलोक में उड़ए. आप स्वेच्छा से उड़ान भरिए. (४)
O Savita Dev! You are a garuda form. Trivrittom is your head. Gayatri verses are your eyes. Brihatsam and Rathantar Sam are both wings of yours. PanchdashTom is your own. Verses are part of you. All yaju are your names. It's your body. Yajnayagnya sam is your tail. The agni contained in the dhishnis is your wings. You are a good mover. You fly into heaven. You fly voluntarily. (4)

यजुर्वेद (अध्याय 12)

यजुर्वेद:
विष्णोः॒ क्रमो॑ऽसि सपत्न॒हा गा॑य॒त्रं छन्द॒ऽआरो॑ह पृथि॒वीमनु॒ विक्र॑मस्व॒ विष्णोः॒ क्रमो॑ऽस्यभिमाति॒हा त्रैष्टु॑भं॒ छन्द॒ऽआरो॑हा॒न्तरि॑क्ष॒मनु॒ विक्र॑मस्व॒ विष्णोः॒ क्रमो॑ऽस्यरातीय॒तो ह॒न्ता जाग॑तं॒ छन्द॒ऽआरो॑ह॒ दिव॒मनु॒ विक्र॑मस्व॒ विष्णोः॒ क्रमो॑ऽसि शत्रूय॒तो ह॒न्तानु॑ष्टुभं॒ छन्द॒ऽआरो॑ह॒ दिशोऽनु॒ विक्र॑मस्व ॥ (५)
हे अग्नि! आप विष्णु के पदन्यास व शत्रुनाशी हैं. आप गायत्री छंद पर आरूढ़ होने व पृथ्वी का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु देव का क्रम न्यास च शत्रु का अभिमान नष्ट करने वाले हैं. आप त्रिष्टुप्‌ छंद पर आरूढ़ होने तथा अंतरिक्ष का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु का पदन्यास और न करने योग्य आचरण करने वाले के नाशक हैं. आप जगती छंद पर आरूढ़ होने और स्वर्गलोक का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. आप विष्णु का पदन्यास तथा शत्रुनाशक हैं. आप अनुष्टुप्‌ छंद पर आरूढ़ होने और सारी दिशाओं का अनुकरण करने की कृपा कीजिए. (५)
O agni! You are vishnu's padmanyas and shatrunashi. Please stick to gayatri verses and imitate the earth. You are going to destroy the pride of vishnu dev and enemy. Please stick to the Trishtup verses and imitate the space. You are the destroyer of vishnu and the destroyer of those who do not behave. Please stick to the worldly verses and follow the heavens. You are vishnu's ascetic and enemy destroyer. Please stick to the verses and follow all directions. (5)

यजुर्वेद (अध्याय 12)

यजुर्वेद:
अक्र॑न्दद॒ग्नि स्त॒नय॑न्निव॒ द्यौः क्षामा॒ रेरि॑हद् वी॒रुधः॑ सम॒ञ्जन्। स॒द्यो ज॑ज्ञा॒नो वि हीमि॒द्धोऽअख्य॒दा रोद॑सी भा॒नुना॑ भात्य॒न्तः ॥ (६)
अग्नि बादल के समान गरजते हैं. स्वर्गलोक से वह पृथ्वी पर व्याप्त होते हैं. वे लताओं को घेर लेते हैं व शीघ्र जलते हैं. वे समिधावान और सब को प्रकाशित करते हैं. वे अपने प्रकाश से सब को प्रकाशित करते हैं. (६)
Fire roars like a cloud. From heaven, they pervade the earth. They surround the vines and burn quickly. They enlighten everyone and all. They illuminate everything with their light. (6)

यजुर्वेद (अध्याय 12)

यजुर्वेद:
अग्ने॑ऽभ्यावर्त्तिन्न॒भि मा॒ निव॑र्त्त॒स्वायु॑षा॒ वर्च॑सा प्र॒जया॒ धने॑न। स॒न्या मे॒धया॑ र॒य्या पोषे॑ण ॥ (७)
हे अग्नि! आप हमारे सम्मुख पधारते हैं. आप आयु, वर्चस्व, संतान व धन के साथ हमारे पास पधारिए. आप बुद्धि, ऐश्वर्य व पोषण के साथ हमारे पास पधारिए. (७)
O agni! You come before us. Come to us with age, dominance, children and wealth. Come to us with wisdom, opulence and nourishment. (7)

यजुर्वेद (अध्याय 12)

यजुर्वेद:
अग्ने॑ऽअङ्गिरः श॒तं ते॑ सन्त्वा॒वृतः॑ सह॒स्रं॑ तऽउपा॒वृतः॑। अधा॒ पोष॑स्य॒ पोषे॑ण॒ पुन॑र्नो न॒ष्टमाकृ॑धि॒ पुन॑र्नो र॒यिमाकृ॑धि ॥ (८)
हे अग्नि! आप श्रेष्ठ अंग बाले हैं. हम आप की सैकड़ों, हजारों परिक्रमाएं करते हैं. आप हमें पोषकता देने बाला पोषण व नष्ट हुआ पशुधन और धन प्राप्त कराने की कृपा कीजिए. (८)
O agni! You are the best part. We do hundreds, thousands of orbits of you. Please give us nutrition and get destroyed livestock and money. (8)
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