हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 13.34

अध्याय 13 → मंत्र 34 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
ध्रु॒वासि॑ ध॒रुणे॒तो ज॑ज्ञे प्र॒थ॒ममे॒भ्यो योनि॑भ्यो॒ऽ अधि॑ जा॒तवे॑दाः। स गा॑य॒त्र्या त्रि॒ष्टुभा॑ऽनु॒ष्टुभा॑ च दे॒वेभ्यो॑ ह॒व्यं व॑हतु प्रजा॒नन् ॥ (३४)
हे उखा! आप ध्रुव व धारक हैं. सर्वज्ञ अग्नि यज्ञ में सर्वप्रथम आप के यहां उत्पन्न हुए. अग्नि, गायत्री, त्रिष्टुप्‌, अनुष्टुप्‌ आदि छंदों से देवताओं के लिए हवि वहन करने की कृपा करें. (३४)
O ukha! You are the pole and the holder. The omniscient agni first originated here in the yagna. Please bear the blessings for the gods with verses like Agni, Gayatri, Trishtup, Anushtup etc. (34)