हरि ॐ

यजुर्वेद (Yajurved)

यजुर्वेद 13.44

अध्याय 13 → मंत्र 44 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

यजुर्वेद:
वरू॑त्रीं॒ त्वष्टु॒र्वरु॑णस्य॒ नाभि॒मविं॑ जज्ञा॒ना रज॑सः॒ पर॑स्मात्। म॒ही सा॑ह॒स्रीमसु॑रस्य मा॒यामग्ने॒ मा हि॑ꣳसीः पर॒मे व्यो॑मन् ॥ (४४)
हे अग्नि! आप विभिन्न रूपों का निर्माण करने बाले हैं. आप वरुण देव की नाभि हैं. आप उच्चलोक में उत्पन्न, महिमावान और परम व्योमवासी हैं. आप हजारों के कल्याणकारी हैं. आप किसी भी प्रकार की हिंसा न कीजिए. (४४)
O agni! You are the ones to create different forms. You are Varun Dev's navel. You are born in the higher world, glorified and the most Vyomwasi. You are the welfare of thousands. Don't indulge in any kind of violence. (44)