यजुर्वेद (अध्याय 13)
चि॒त्रं दे॒वाना॒मुद॑गा॒दनी॑कं॒ चक्षु॑र्मि॒त्रस्य॒ वरु॑णस्या॒ग्नेः। आ प्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वीऽ अ॒न्तरि॑क्ष॒ꣳ सूर्य्य॑ऽ आ॒त्मा जग॑तस्त॒स्थुष॑श्च ॥ (४६)
हे अग्नि! मित्र देव और वरुण देव आप के नेत्ररूप हैं. आप अद्भुत शक्तिमान हैं. आप स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक को पूरी तरह प्रकाशित कीजिए. सूर्य जड़ और चेतन की आत्मा हैं. वे इसी रूप में उदित हुए हैं. (४६)
O agni! Friends Dev and Varun Dev are your eyes. You are amazing power. You fully illuminate heaven, earth and space world. The sun is the root and the soul of the conscious. They have risen in this form. (46)