यजुर्वेद (अध्याय 15)
स॒म्राड॑सि प्र॒तीची॒ दिगा॑दि॒त्यास्ते॑ दे॒वाऽअधि॑पतयो॒ वरु॑णो हेती॒नां प्र॑तिध॒र्त्ता स॑प्तद॒शस्त्वा॒ स्तोमः॑ पृथि॒व्याश्र॑यतु मरुत्व॒तीय॑मु॒क्थमव्य॑थायै स्तभ्नातु वैरू॒पꣳ साम॒ प्रति॑ष्ठित्याऽअ॒न्तरि॑क्ष॒ऽऋष॑यस्त्वा प्रथम॒जा दे॒वेषु॑ दि॒वो मात्र॑या वरि॒म्णा प्र॑थन्तु विध॒र्त्ता चा॒यमधि॑पतिश्च॒ ते त्वा॒ सर्वे॑ संविदा॒ना नाक॑स्य पृ॒ष्ठे स्व॒र्गे लो॒के यज॑मानं च सादयन्तु ॥ (१२)
हे इष्टके! आप पश्चिम दिशा के सम्राट् हैं. आदित्य आप के देवता हैं. वरुण आप के अधिपति हैं. आप प्रतिधारणकर्ता हैं. सप्तदश स्तोम दिशा के सम्राट् हैं. मरुत् उक्थ दिशा के सम्राट् हैं. वैरूप साम दिशा के सम्राट् हैं. वह अंतरिक्ष में दूढ़ता हेतु आप को प्रतिष्ठित करें. सृष्टि क्रम में प्रथम जन्मे ऋषि आप को देवलोक में स्थित करें. इस तरह समस्त वसु आदि देवता याजकों को सुखसंपन्न स्वर्गलोक में ले जाएं. (१२)
Oh my god! You are the emperor of the west direction. Aditya is your god. Varun is your boss. You are a retentionist. Saptadash is the emperor of the storm direction. Marut is the emperor of the ukth direction. Vairupa is the emperor of sama direction. May he distinguish you for the weakness in space. The first born sage in the order of creation should place you in Devlok. In this way, all the devas like Vasu etc. should take the priests to the heavenly paradise. (12)