यजुर्वेद (अध्याय 15)
एव॒श्छन्दो॒ वरि॑व॒श्छन्दः॑ श॒म्भूश्छन्दः॑ परि॒भूश्छन्द॑ऽआ॒च्छच्छन्दो॒ मन॒श्छन्दो॒ व्यच॒श्छन्दः॒॑ सिन्धु॒श्छन्दः॑ समु॒द्रश्छन्दः॑ सरिरं॒ छन्दः॑ क॒कुप् छन्द॑स्त्रिक॒कुप् छन्दः॑ का॒व्यं छन्दो॑ऽअङ्कु॒पं छन्दो॒ऽक्षर॑पङ्क्ति॒श्छन्दः॑ प॒दप॑ङ्क्ति॒श्छन्दो॑ विष्टा॒रप॑ङ्क्ति॒श्छन्दः क्षु॒रश्छन्दो॒ भ्रज॒श्छन्दः॑ ॥ (४)
हम एव छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वरिव छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम शंभू छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम परिभू छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम आच्छ छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम मन से आप की स्थापना करते हैं. हम व्यच से आप की स्थापना करते हैं. हम सिंधु से आप की स्थापना करते हैं. हम समुद्र से आप की स्थापना करते हैं. हम सरिर से आप की स्थापना करते हैं. हम ककुप् से आप की स्थापना करते हैं. हम त्रिक ककुप् से आप की स्थापना करते हैं. हम काव्य से आप की स्थापना करते हैं. हम अंकुप् से आप की स्थापना करते हैं. हम अक्षर से आप की स्थापना करते हैं. हम पंक्ति से आप की स्थापना करते हैं. हम पदपंक्ति से आप की स्थापना करते हैं. हम विष्टारपंक्ति से आप की स्थापना करते हैं. हम क्षुरोभ्रज से आप की स्थापना करते हैं. (४)
We establish you with verses. We establish you with verses. We establish you with Shambhu verses. We establish you from paribhu verses. We establish you from the verses. We set up you with our mind. We set you up from The Watch. We establish you from Sindhu. We establish you from the sea. We set up you from Sarir. We set up you from Kakup. We set you up from the triad. We establish you from poetry. We set up you from Ankup. We set you up from the letter. We set you up from the line. We establish you by step. We establish you from the specific line. We establish you from the womb. (4)