यजुर्वेद (अध्याय 15)
स॒म्प्रच्य॑वध्व॒मुप॑ सं॒प्रया॒ताग्ने॑ पथो॒ दे॑व॒याना॑न् कृणुध्वम्। पुनः॑ कृण्वा॒ना पि॒तरा॒ युवा॑ना॒न्वाता॑सी॒त् त्वयि॒ तन्तु॑मे॒तम् ॥ (५३)
हे ऋषिगणो! आप अग्नि के समीप पधारिए. आप इन्हें प्रज्वलित करने व देवताओं का पथ प्रदर्शित करने की कृपा कीजिए. हमारे पितरों ने पुनः आप को युबा बनाया. पितरों ने पुनः यज्ञों में आप का विस्तार किया. (५३)
O sages! You come near the agni. Please ignite them and show the path of the gods. Our fathers again made you Yuba. The ancestors again expanded you in the yagyas. (53)