यजुर्वेद (अध्याय 18)
मि॒त्रश्च॑ म॒ऽइन्द्र॑श्च मे॒ वरु॑णश्च म॒ऽइन्द्र॑श्च मे धा॒ता च॑ म॒ऽइन्द्र॑श्च मे॒ त्वष्टा॑ च म॒ऽइन्द्र॑श्च मे म॒रुत॑श्च म॒ऽइन्द्र॑श्च मे विश्वे॑ च मे दे॒वाऽइन्द्र॑श्च मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥ (१७)
ज्ञ से मित्र देव और इंद्र देव, वरुण देव और इंद्र देव, धाता देव और इंद्र देव, त्वष्टा और इंद्र देव व मरुत् और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यज्ञ से विशव देव और इंद्र देव की अनुकंपा में बढ़ोतरी हो. यह यज्ञ हमारे लिए सर्वविध फलीभूत हो. (१७)
May the compassion of Friends Dev and Indra Dev, Varun Dev and Indra Dev, Dhata Dev and Indra Dev, Tvashta and Indra Dev and Indra Dev and Indra Dev increase. May the yajna increase the compassion of Vishva Dev and Indra Dev. May this yajna be all-fruitful for us. (17)