यजुर्वेद (अध्याय 18)
आ॒ग्र॒य॒णश्च॑ मे वैश्वदे॒वश्च॑ मे ध्रु॒वश्च॑ मे वैश्वान॒रश्च॑ मऽऐन्द्रा॒ग्नश्च॑ मे म॒हावै॑श्वदेवश्च मे मरुत्व॒तीया॑श्च मे॒ निष्के॑वल्यश्च मे सावि॒त्रश्च॑ मे सारस्व॒तश्च॑ मे पात्नीव॒तश्च॑ मे हारियोज॒नश्च॑ मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥ (२०)
इस यज्ञ से आग्रयण, विश्व, रुव देव, वैश्वानर, इंद्र देव और अग्नि, महावैश्व देव, मरुत्वतीय देव, निष्केवल्य देव, सावित्र देव, सारस्वत देव हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. इस यज्ञ से पात्नीवत व हारियोजन हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. यज्ञ सर्वविध हमारे लिए फलीभूत हो. (२०)
From this yajna, grace the agrayan, vishwa, ruv dev, vaishvanar, indra dev and agni, mahavaishva dev, maruttvaiya dev, nishkevalya dev, savitra dev, saraswat dev to be favorable to us. Please be kind to be favorable to us with this yajna. May yajna all come to fruition for us. (20)