यजुर्वेद (अध्याय 18)
व्र॒तं च॑ मऽऋ॒तव॑श्च मे॒ तप॑श्च मे संवत्स॒रश्च॑ मेऽहोरा॒त्रेऽऊ॑र्वष्ठी॒वे बृ॑हद्रथन्त॒रे च॑ मे य॒ज्ञेन॑ कल्पन्ताम् ॥ (२३)
ज्ञ से ब्रत, तप, वर्षा, दिनरात व यज्ञ से ऊर्वष्ठि हमारे अनुकूल होने की कृपा करे. यज्ञ से बृहद्रथंतर हमारे अनुकूल होने की कृपा करों. यह यज्ञ सर्वविध फलीभूत होने की कृपा करे. (२३)
May the sacrifices of brat, penance, rain, day and night and sacrifice be pleased with us. Please bless us with the sacrifice. May this yajna be fully fruitful. (23)