यजुर्वेद (अध्याय 2)
ए॒षा ते॑ऽअग्ने स॒मित्तया॒ वर्ध॑स्व॒ चा च प्यायस्व। व॒र्धि॒षी॒महि॑ च व॒यमा च॑ प्यासिषीमहि। अग्ने॑ वाजजि॒द् वाजं॑ त्वा संसृ॒वासं॑ वाज॒जित॒ꣳ सम्मा॑र्ज्मि ॥ (१४)
हे अग्नि! यह आप की बढ़ोतरी के लिए समिधा है. आप अपनी बढ़ोतरी के साथ हमारी भी बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. हम आप की बढ़ोतरी करते हैं. हम अपनी बढ़ोतरी पाते हैं. अग्नि अन्न उपजाते हैं. हम आप का सम्मार्जन करते हैं अर्थात् आप को जल से सीचते हैं. (१४)
O agni! This is the same for your growth. Please increase us with your increase. We will increase yours. We find our growth. Fire produces food. We salute you, that is, we clean you with water. (14)