यजुर्वेद (अध्याय 27)
दैव्या॑ होताराऽ उ॒र्ध्वम॑ध्व॒रं नो॒ऽग्नेर्जिह्वाम॒भि गृ॑णीतम्। कृ॒णु॒तं नः॒ स्विष्टिम् ॥ (१८)
दिव्य अध्वर्युं अग्नि और वायु! विधिवत इस यज्ञ को संपन्न कराने की कृपा करें. अग्नि की जिह्वा ऊपर की ओर बढ़ती है. वे हमें भी ऊपर बढ़ने की प्रेरणा देने की कृपा करें. (१८)
Divine Adhwaryun Fire and Air! Please duly perform this yajna. The tongue of agni moves upwards. Please inspire us to move up too. (18)