यजुर्वेद (अध्याय 34)
न तद्रक्षा॑सि॒ न पि॑शा॒चास्त॑रन्ति दे॒वाना॒मोजः॑ प्रथम॒जꣳ ह्ये॒तत्। यो बि॒भर्ति॑ दाक्षाय॒णꣳ हिर॑ण्य॒ꣳ स दे॒वेषु॑ कृणुते दी॒र्घमायुः॒ स म॑नु॒ष्येषु कृणुते दी॒र्घमायुः॑ ॥ (५१)
इस स्वर्णमय धन को राक्षस हिंसित नहीं करते. इस स्वर्णमय धन को पिशाच भी हिंसित नहीं करते. यह स्वर्णमय प्रथम उत्पन्न देवताओं का ओज है, जो दक्षवंशीय ब्राह्मण इसे स्वर्णधन आभूषण के रूप में धारते हैं, उन्हें भी देवता मनुष्यों में दीर्घायु प्रदान करते हैं. (५१)
Demons do not hide this golden wealth. Even vampires do not hide this golden wealth. This golden first born deities are the ode, the Dakshavanshi Brahmins who hold it as a golden ornament, the gods also give longevity to humans. (51)