यजुर्वेद (अध्याय 7)
उ॒प॒या॒मगृ॑हीतोऽसि॒ मध॑वे त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ माध॑वाय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि शु॒क्राय॑ त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ शुच॑ये त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ नभ॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि नभ॒स्याय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसी॒षे त्वो॑पया॒मगृ॑हीतोऽस्यू॒र्जे त्वो॑पया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ सह॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि सह॒स्याय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि॒ तप॑से त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽसि तप॒स्याय त्वोपया॒मगृ॑हीतोऽस्यꣳहसस्प॒तये॑ त्वा ॥ (३०)
हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मधु के लिए कलश से ग्रहण किया गया है. आप को माधव हेतु ग्रहण किया गया है. आप को शुक्र के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को पवित्रता के लिए ग्रहण किया गया है. आप को नभ हेतु ग्रहण किया गया है. आप को ऊर्जा हेतु ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को साहस के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को साहस से ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को तप के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को मर्यादा के लिए ग्रहण किया गया है. (३०)
O Mon! You have been eclipsed in the urn. You have been eclipsed from the urn for honey. You have been accepted for Madhav. You have been eclipsed to Venus. O Mon! You have been accepted for purity. You have been assumed to be good. You have been absorbed for energy. O Mon! You have been eclipsed for courage. O Mon! You have been embraced with courage. O Mon! You have been eclipsed for tenacity. O Mon! You have been accepted for dignity. (30)