यजुर्वेद (अध्याय 7)
स॒जोषा॑ऽइन्द्र॒ सग॑णो म॒रुद्भिः॒ सोमं॑ पिब वृत्र॒हा शू॑र वि॒द्वान्। ज॒हि शत्रूँ॒२रप॒ मृधो॑ नुद॒स्वाथाभ॑यं कृणुहि वि॒श्वतो॑ नः। उ॒प॒या॒मगृ॑हीतो॒ऽसीन्द्रा॑य त्वा म॒रुत्व॑तऽए॒ष ते॒ योनि॒रिन्द्रा॑य त्वा म॒रुत्व॑ते ॥ (३७)
हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर नाशक, शूरवीर, विद्वान् हैं. मरुदगणों के साथ इस यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. आप शत्रुओं को दूर एवं उन का नाश कीजिए. आप हमें सब ओर से सुरक्षा प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव व मरुद् देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल स्थान है. (३७)
O Indra Dev! You are a destroyer, a knight, a scholar. Please come to this yajna with the Marudganas. You remove the enemies and destroy them. Please provide us security from all sides. You have been received in the kalash for Indra Dev and Marud Dev. That is the original place of Indra Dev and Marudgana. (37)