अथर्ववेद (कांड 1)
यद्य॒र्चिर्यदि॒ वासि॑ शो॒चिः श॑कल्ये॒षि यदि॑ वा ते ज॒नित्र॑म् । ह्रूडु॒र्नामा॑सि हरितस्य देव॒ स नः॑ संवि॒द्वान्परि॑ वृङ्ग्धि तक्मन् ॥ (२)
हे जीवन को दुःखमय बनाने वाले ज्वर! तू यद्यपि उष्णता कारक एवं सुखाने वाला है. यद्यपि तेरा जन्म अग्नि से हुआ है, तथापि हे दीप्तिशाली ज्वर! तू मनुष्य के शरीर में पीले रंग को उत्पन्न करने वाला है. इसलिए तू हूढ़ नाम से प्रसिद्ध है. तू हमारे गरम जल से भीगे हुए शरीर को अपना जन्म स्थान अग्नि जान कर हमारे शरीर से बाहर निकल जा. (२)
O fever that makes life miserable! You are, however, a heat factor and dry. Though you were born out of agni, O radiant fever! You are going to produce yellow color in the human body. That is why you are famous by the name Hudh. You know our hot water-soaked body as your birth place agni and get out of our body. (2)