हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 1.27.4

कांड 1 → सूक्त 27 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 27
प्रेतं॑ पादौ॒ प्र स्फु॑रतं॒ वह॑तं पृण॒तो गृ॒हान् । इ॑न्द्रा॒ण्ये॑तु प्रथ॒माजी॒तामु॑षिता पु॒रः ॥ (४)
हे चलने के इच्छुक व्यक्ति के चरणो! तुम आगे बढ़ो एवं शीघ्र चलने के लिए गति करो. तुम हमें इच्छित फल देने वाले पुरुष के निवास स्थान तक पहुंचाओ. किसी से पराजित न होने वाले इंद्र की पत्नी हमारी सेना की देवता हैं. वह हमारी सेना की रक्षा के लिए आगेआगे चलें. (४)
O steps of the person willing to walk! You move forward and move quickly. You bring us to the abode of the man who gives us the desired fruit. Indra's wife, who is not defeated by anyone, is the god of our army. He should go ahead to protect our army. (4)