हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 1.33.3

कांड 1 → सूक्त 33 → मंत्र 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 33
यासां॑ दे॒वा दि॒वि कृ॒ण्वन्ति॑ भ॒क्षं या अ॒न्तरि॑क्षे बहु॒धा भ॑वन्ति । या अ॒ग्निं गर्भं॑ दधि॒रे सु॒वर्णा॒स्ता न॒ आपः॒ शं स्यो॒ना भ॑वन्तु ॥ (३)
इंद्र आदि देव जिन जलों के सार रूप अमृत को द्युलोक में भक्षण करते हैं तथा जो जल अनेक प्रकार से स्थित रहते हैं, जिन शोभन वर्ण वाले जलों ने अग्नि को गर्भ के रूप में धारण किया है, वे जल हमारे लिए रोग के नाशक और सुखकारक हों. (३)
Indra adi dev, the waters whose essence of nectar is consumed in the sun and the water which is located in many ways, the waters with shobhan color that have taken agni as a womb, those waters should be the destroyers and beneficial of disease for us. (3)