हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 1.33.4

कांड 1 → सूक्त 33 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 33
शि॒वेन॑ मा॒ चक्षु॑षा पश्यतापः शि॒वया॑ त॒न्वोप॑ स्पृशत॒ त्वचं॑ मे । घृ॑त॒श्चुतः॒ शुच॑यो॒ याः पा॑व॒कास्ता न॒ आपः॒ शं स्यो॒ना भ॑वन्तु ॥ (४)
हे जल के अभिमानी देव! मुझे सुखकर दृष्टि से देखो तथा अपने कल्याणकारी शरीर से मेरी देह का स्पर्श करो. जो जल अमृत को टपकाने वाले तथा पवित्र करने वाले हैं, वे हमारे लिए रोग विनाशक और सुखकारी हों. (४)
O proud God of water! Look at me happily and touch my body with your welfare body. The water that drips and purifies nectar, let it be disease-destroying and happy for us. (4)