अथर्ववेद (कांड 1)
मधु॑मन्मे नि॒क्रम॑णं॒ मधु॑मन्मे प॒राय॑णम् । वा॒चा व॑दामि॒ मधु॑मद्भू॒यासं॒ मधु॑संदृशः ॥ (३)
हे मधु लता! तुम्हें धारण करने से मेरा निकट गमन दूसरों को प्रसन्न करने वाला हो तथा मेरा दूर गमन दूसरों को प्रसन्न करे. मैं वाणी से मधुयुक्त हो कर तथा समस्त कार्यो के द्वारा मधु के समान बन कर सब के प्रेम का पात्र बनू. (३)
O Madhu Lata! By wearing you, may my close journey be pleasing to others and may my distance move please others. I should become like honey by speech and become like honey through all actions and become the object of love of all. (3)