हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 1.35.2

कांड 1 → सूक्त 35 → मंत्र 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 1)

अथर्ववेद: | सूक्त: 35
नैनं॒ रक्षां॑सि॒ न पि॑शा॒चाः स॑हन्ते दे॒वाना॒मोजः॑ प्रथम॒जं ह्ये॒तत् । यो बिभ॑र्ति दाक्षाय॒णं हिर॑ण्यं॒ स जी॒वेषु॑ कृणुते दी॒र्घमायुः॑ ॥ (२)
स्वर्ण बंधे हुए इस पुरुष को राक्षस और पिशाच पराजित नहीं कर सकते, वयोंकि यह देवों का प्रथम उत्पन्न हुआ ओज है. दक्ष पुत्रों से संबंधित इस स्वर्ण को जो बांधता है, वह प्राणियों के मध्य सौ वर्ष की आयु प्राप्त करता है. (२)
Demons and vampires cannot defeat this man tied to gold, because it is the first born oz of gods. The one who binds this gold related to daksha sons attains the age of a hundred years among the creatures. (2)