अथर्ववेद (कांड 1)
समा॑नां मा॒सामृ॒तुभि॑ष्ट्वा व॒यं सं॑वत्स॒रस्य॒ पय॑सा पिपर्मि । इ॑न्द्रा॒ग्नी विश्वे॑ दे॒वास्ते ऽनु॑ मन्यन्ता॒महृ॑णीयमानाः ॥ (४)
हे संपत्ति चाहने वाले पुरुष! मैं तुझे संवत्सरों की, महीनों की, ऋतु.ओं की एवं काल संबंधी दूध की धार से पूर्ण करता हूं. इंद्र और अग्नि तथा समस्त देव क्रोध न करते हुए तुझे संपन्नता की अनुमति दें. (४)
O property-seeking men! I complete you with the edge of samvatsaras, months, seasons and time-related milk. May Indra and Agni and all gods allow you prosperity without getting angry. (4)