अथर्ववेद (कांड 1)
ऐषां॑ य॒ज्ञमु॒त वर्चो॑ ददे॒ऽहं रा॒यस्पोष॑मु॒त चि॒त्तान्य॑ग्ने । स॒पत्ना॑ अ॒स्मदध॑रे भवन्तूत्त॒मं नाक॒मधि॑ रोहये॒मम् ॥ (४)
हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से मैं इन शत्रुओं के स्वर्ग आदि लोकों के साधक यज्ञ, कर्म, तेज, धन एवं चित्त का हरण करता हूं. मेरे शत्रु मुझ से निम्न स्थिति में रहें. आप मुझ यजमान को सभी दुःखों से रहित एवं उत्तम स्वर्ग में पहुंचा दो. (४)
O agni! By your grace, I remove the seeker yajna, karma, radiance, wealth and mind of these enemies in the heavens etc. May my enemies be in a lower position than me. May you bring my host to a better heaven without all suffering. (4)