अथर्ववेद (कांड 10)
वात॑ इव वृ॒क्षान्नि मृ॑णीहि पा॒दय॒ मा गामश्वं॒ पुरु॑ष॒मुच्छि॑ष एषाम् । क॒र्तॄन्नि॒वृत्ये॒तः कृ॑त्येऽप्रजा॒स्त्वाय॑ बोधय ॥ (१७)
हे कृत्या! वायु जिस प्रकार वृक्षों को उखाड़ देती है, उसी प्रकार तू शत्रुओं को कुचल दे. उन शत्रुओं की गाएं, घोड़े और पुरुष शेष न रहें. तू अपने बनाने वालों के पास जा एवं उन्हें संतानहीन बना. (१७)
O act! Just as the wind uproots the trees, so crush the enemies. The songs of those enemies, horses and men should not remain. Go to your makers and make them childless. (17)