हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.2.19

कांड 10 → सूक्त 2 → मंत्र 19 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
केन॑ प॒र्जन्य॒मन्वे॑ति॒ केन॒ सोमं॑ विचक्ष॒णम् । केन॑ य॒ज्ञं च॑ श्र॒द्धां च॒ केना॑स्मि॒न्निहि॑तं॒ मनः॑ ॥ (१९)
यह पुरुष किस प्रभाव से बादलों को प्राप्त करता और सोमलता को खोजता है? यह पुरुष यज्ञ को और श्रद्धा को किस के द्वारा प्राप्त करता है तथा इस के मन को उत्तम कमों में किस ने संलग्न किया है? (१९)
With what effect does this man acquire clouds and search for Somlata? Through whom does this man attain yajna and reverence and who has engaged his mind in the best of the lowest? (19)