अथर्ववेद (कांड 10)
ऊ॒र्ध्वो नु सृ॒ष्टास्ति॒र्यङ्नु सृ॒ष्टा३स्सर्वा॒ दिशः॒ पुरु॑ष॒ आ ब॑भू॒वाँ३ । पुरं॒ यो ब्रह्म॑णो॒ वेद॒ यस्याः॒ पुरु॑ष उ॒च्यते॑ ॥ (२८)
जिस ब्रह्म को पुरुष कहा जाता है, उस की पुरी को जो जानता है, उसी ने ऊपरी और तिरछे भागों का निर्माण किया है. वही पुरुष समस्त दिशाओं में व्याप्त है. (२८)
He who knows the puri of Brahman, who is called purusha, has created the upper and oblique parts. The same man is pervading all directions. (28)