अथर्ववेद (कांड 10)
न वै तं चक्षु॑र्जहाति॒ न प्रा॒णो ज॒रसः॑ पु॒रा । पुरं॒ यो ब्रह्म॑णो॒ वेद॒ यस्याः॒ पुरु॑ष उ॒च्यते॑ ॥ (३०)
जो ब्रह्म की पुरी अर्थात् निवास स्थान को जानता है और उस में शयन करने के कारण ही ब्रह्म पुरुष कहा जाता है, उसे जो जानता है, वृद्धावस्था तक नेत्र एवं प्राण उस का त्याग नहीं करते. (३०)
One who knows the puri of Brahman i.e. the place of residence and is called Brahma Purush because of sleeping in it, who knows him, eyes and soul do not give up him till old age. (30)