हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.2.33

कांड 10 → सूक्त 2 → मंत्र 33 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 2
प्र॒भ्राज॑मानां॒ हरि॑णीं॒ यश॑सा सं॒परी॑वृताम् । पुरं॑ हिर॒ण्ययीं॒ ब्रह्मा वि॑वे॒शाप॑राजिताम् ॥ (३३)
उस प्रकाशमान, पाप का विनाश करने वाली, यश से ढकी हुई एवं हिरण्यमय पुरी में ब्रह्म प्रवेश करता है. (३३)
Brahma enters that luminous, destroyer of sin, covered with fame and hiranyamaya puri. (33)