अथर्ववेद (कांड 10)
यथा॒ वातो॒ वन॒स्पती॑न्वृ॒क्षान्भ॒नक्त्योज॑सा । ए॒वा स॒पत्ना॑न्मे भङ्ग्धि॒ पूर्वा॑ञ्जा॒ताँ उ॒ताप॑रान्वर॒णस्त्वा॒भि र॑क्षतु ॥ (१३)
वायु जिस प्रकार अपनी शक्ति से वृक्षों एवं वनस्पतियों को तोड़ देती है, उसी प्रकार यह मणि मेरे पूर्ववर्ती और बाद में होने वाले शत्रुओं का विनाश कर के मेरी रक्षा करे. (१३)
Just as the wind breaks the trees and vegetation with its power, so this gem should protect me by destroying my previous and later enemies. (13)