अथर्ववेद (कांड 10)
तांस्त्वं प्र च्छि॑न्द्धि वरण पु॒रा दि॒ष्टात्पु॒रायु॑षः । य ए॑नं प॒शुषु॒ दिप्स॑न्ति॒ ये चा॑स्य राष्ट्रदि॒प्सवः॑ ॥ (१६)
हे वरण वृक्ष से निर्मित मणि! जो इस यजमान के पशुओं एवं राष्ट्र का अपहरण करना चाहते हैं, तू उन के भाग्य और आयु को उन से छीन कर उन्हे नष्ट कर दे. (१६)
O gem made from the tree! Those who want to kidnap the animals and nation of this host, you should take away their fate and age from them and destroy them. (16)