अथर्ववेद (कांड 10)
अङ्गा॑दङ्गा॒त्प्र च्या॑वय॒ हृद॑यं॒ परि॑ वर्जय । अधा॑ वि॒षस्य॒ यत्तेजो॑ऽवा॒चीनं॒ तदे॑तु ते ॥ (२५)
हे रोगी! तू अपने प्रत्येक अंग से विष को टपकाता हुआ अपने हृदय की रक्षा कर. विष का जो तेज है, वह अधोगति को प्राप्त हो कर नष्ट हो जाए. (२५)
O patient! Protect your heart by dripping poison from each part of you. The intensity of the poison should be destroyed by attaining degradation. (25)