हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.5.17

कांड 10 → सूक्त 5 → मंत्र 17 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
यो व॑ आपो॒ऽपां व॒त्सोऽप्स्व॒न्तर्य॑जु॒ष्यो देव॒यज॑नः । इ॒दं तमति॑ सृजामि॒ तं माभ्यव॑निक्षि । तेन॒ तम॒भ्यति॑सृजामो॒ यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः । तं व॑धेयं॒ तं स्तृ॑षीया॒नेन॒ ब्रह्म॑णा॒नेन॒ कर्म॑णा॒नया॑ मे॒न्या ॥ (१७)
हे जलो! तुम में जो जलों का वत्स है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं देवों से संयुक्त है. मैं उसे अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जलों के वे वत्स मुझे पुष्ट करें. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के वत्स रूपी शस्त्र से आच्छादित कर के उन्हें न्ट करता हूं. (१७)
O burn! The vatsa of water in you is worthy of service by the mantras of Yajurveda and is united with the devas. I send him to my enemies. Those vats of water reinforce me. I cover them with the witchcraft caused by this mantra and the weapon of water. (17)