हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.5.18

कांड 10 → सूक्त 5 → मंत्र 18 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
यो व॑ आपो॒ऽपां वृ॑ष॒भो॒प्स्व॒न्तर्य॑जु॒ष्यो देव॒यज॑नः । इ॒दं तमति॑ सृजामि॒ तं माभ्यव॑निक्षि । तेन॒ तम॒भ्यति॑सृजामो॒ यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः । तं व॑धेयं॒ तं स्तृ॑षीया॒नेन॒ ब्रह्म॑णा॒नेन॒ कर्म॑णा॒नया॑ मे॒न्या ॥ (१८)
हे जलो! तुम में जो वृषभ अर्थात्‌ बैल है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं देवों से संयुक्त है. उसे में अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का वृषभ मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के वृषभ रूपी शस्त्र से उन्हें न्ट करता हूं. (१८)
O burn! The Taurus i.e. bull in you is able to serve through the mantras of Yajurveda and is united with the gods. I send him towards my enemies. May the Taurus of water strengthen me. I chant them with the magic done by this mantra and with the Taurus-like weapon of water. (18)