हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.5.19

कांड 10 → सूक्त 5 → मंत्र 19 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
यो व॑ आपो॒ऽपां हि॑रण्यग॒र्भो॒प्स्व॒न्तर्य॑जु॒ष्यो देव॒यज॑नः । इ॒दं तमति॑ सृजामि॒ तं माभ्यव॑निक्षि । तेन॒ तम॒भ्यति॑सृजामो॒ यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः । तं व॑धेयं॒ तं स्तृ॑षीया॒नेन॒ ब्रह्म॑णा॒नेन॒ कर्म॑णा॒नया॑ मे॒न्या ॥ (१९)
हे जलो! तुम्हारे मध्य जो हिरण्यगर्भ है, वह यजुर्वेद के मंत्रों द्वारा सेवा करने योग्य है एवं देवों से संयुक्त है. उसे मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जल का हिरण्यगर्भ अंश मुझे पुष्ट करे. मैं इस मंत्र के द्वारा होने वाले जादूटोने से और जल के हिरण्यगर्भ रूपी शस्त्र से उन्हें नष्ट करता हूं. (१९)
O burn! The Hiranyagarbha among you is worthy of service by the mantras of Yajurveda and is united with the devas. I send him towards my enemies. May the hiranyagarbha part of the water strengthen me. I destroy them with the witchcraft caused by this mantra and with the weapon of hiranyagarbha of water. (19)