अथर्ववेद (कांड 10)
यो व॑ आपो॒ऽपाम॒ग्नयो॒ऽप्स्वन्तर्य॑जु॒ष्यो॑ष्या देव॒यज॑नाः । इ॒दं तानति॑ सृजामि॒ तं माभ्यव॑निक्षि । तैस्तम॒भ्यति॑सृजामो॒ यो॒स्मान्द्वेष्टि॒ यं व॒यं द्वि॒ष्मः । तं व॑धेयं॒ तं स्तृ॑षीया॒नेन॒ ब्रह्म॑णा॒नेन॒ कर्म॑णा॒नया॑ मे॒न्या ॥ (२१)
हे जलो! तुम में जो अग्नियां हैं, वे यजुर्वेद के मंत्रों के द्वारा सेवा करने योग्य एवं देवों की संगति करने वाली हैं. उन्हें मैं अपने शत्रुओं की ओर भेजता हूं. जलों की अग्नियां मुझे पुष्ट करें. इस मंत्र की शक्ति से होने वाले जादूटोने के द्वारा और जल रूपी अस्त्र के द्वारा मैं अपने शत्रुओं को नष्ट करता हूं. (२१)
Oh my god! The agnis in you are worthy of service through the mantras of Yajurveda and are going to associate with the gods. I send them towards my enemies. May the agni of the waters strengthen me. I destroy my enemies by the magic of the power of this mantra and through the weapon of water. (21)