हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.6.25

कांड 10 → सूक्त 6 → मंत्र 25 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 6
यमब॑ध्ना॒द्बृह॒स्पति॑र्दे॒वेभ्यो॒ असु॑रक्षितिम् । स मा॒यं म॒णिराग॑म॒न्मधो॑र्घृ॒तस्य॒ धार॑या की॒लाले॑न म॒णिः स॒ह ॥ (२५)
असुरों का विनाश करने वाली जिस मणि को बृहस्पति ने देवों के हाथों में बांधा था, वही मणि मधु एवं घृत की धाराओं तथा मदिरा की धाराओं के साथ मुझे प्राप्त हुई है. (२५)
I have received the same gem that Jupiter had tied in the hands of the gods, which destroyed the asuras, with the streams of madhu and ghrit and the streams of wine. (25)