अथर्ववेद (कांड 10)
हिर॑ण्यस्रग॒यं म॒णिः श्र॒द्धां य॒ज्ञं महो॒ दध॑त् । गृ॒हे व॑सतु॒ नोऽति॑थिः ॥ (४)
सुवर्ण की माला से युक्त यह मणि श्रद्धा, यज्ञ एवं तेज को धारण करती हुई हमारे घर में अतिथि बन कर निवास करे. (४)
This gem with a garland of gold should be a guest in our house wearing reverence, sacrifice and glory. (4)