हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.7.34

कांड 10 → सूक्त 7 → मंत्र 34 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
यस्य॒ वातः॑ प्राणापा॒नौ चक्षु॒रङ्गि॑र॒सोऽभ॑वन् । दिशो॒ यश्च॒क्रे प्र॒ज्ञानी॒स्तस्मै॑ ज्ये॒ष्ठाय॒ ब्रह्म॑णे॒ नमः॑ ॥ (३४)
वायु जिस के प्राण और अपान तथा अंगिरस जिस के नेत्र बने थे तथा दिशाओं को जिस ने अपनी प्रज्ञा का साधन बनाया था, उस ज्येष्ठ के लिए मेरा नमस्कार है. (३४)
I salute the eldest man whose life and apana and angiras whose eyes were made and the directions who made the instrument of his wisdom. (34)