हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 10.7.36

कांड 10 → सूक्त 7 → मंत्र 36 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 10)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
यः श्रमा॒त्तप॑सो जा॒तो लो॒कान्त्सर्वा॑न्त्समान॒शे । सोमं॒ यश्च॒क्रे केव॑लं॒ तस्मै॑ ज्ये॒ष्ठाय॒ ब्रह्म॑णे॒ नमः॑ ॥ (३६)
जो तपस्या रूपी श्रम से उत्पन्न हो कर समस्त लोकों में व्याप्त रहता है तथा जिस ने एक मात्र सोमलता को ही उत्तम जड़ी बनाया है, उस श्रेष्ठ परमात्मा के लिए मेरा नमस्कार है. (३६)
I salute the supreme God who is born out of the labor of penance and pervades all the worlds and who has made only Somalata the best herb. (36)