अथर्ववेद (कांड 10)
यतः॒ सूर्य॑ उ॒देत्यस्तं॒ यत्र॑ च॒ गच्छ॑ति । तदे॒व म॑न्ये॒ऽहं ज्ये॒ष्ठं तदु॒ नात्ये॑ति॒ किं च॒न ॥ (१६)
सूर्य जहां से उदय होता है और जहां अस्त होता है, मैं उसी को सब से बड़ा मानता हूं. कोई भी उस का अतिक्रमण नहीं करता अर्थात् कोई भी उस से महान नहीं है. (१६)
Where the sun rises and where it sets, I consider it to be the greatest. No one transgresses him, that is, no one is greater than him. (16)