अथर्ववेद (कांड 10)
अ॒पादग्रे॒ सम॑भव॒त्सो अग्रे॒ स्वराभ॑रत् । चतु॑ष्पाद्भू॒त्वा भोग्यः॒ सर्व॒माद॑त्त॒ भोज॑नम् ॥ (२१)
सब से पहले चरणहीन आत्मा उत्पन्न हुआ. उस ने आगे चल कर आनंद को अपने में पूर्ण किया. उस ने चार चरणों वाला अर्थात् अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चतुर्वर्ग बन कर समस्त भोजन को स्वीकार किया अर्थात् सारे भोग भोगे. (२१)
First of all the stepless souls arose. He went ahead and completed the joy in himself. He accepted all the food by becoming a four-step i.e. meaning, dharma, work, salvation chaturvarga, that is, enjoy all the enjoyments. (21)