अथर्ववेद (कांड 10)
यद॑न्त॒रा द्यावा॑पृथि॒वी अ॒ग्निरैत्प्र॒दह॑न्विश्वदा॒व्यः । यत्राति॑ष्ठ॒न्नेक॑पत्नीः प॒रस्ता॒त्क्वेवासीन्मात॒रिश्वा॑ त॒दानी॑म् ॥ (३९)
इस संसार को जलाने वाली अग्नि द्यावा और पृथ्वी के मध्य आती है. वहीं पोषण करने वाली देवियां निवास करती हैं. उस समय मातारिश्वा अर्थात् वायु कहां रहती है? (३९)
The agni that burns this world comes between Dyava and the earth. There are nurturing goddesses. Where does Matarishva i.e. air reside at that time? (39)