अथर्ववेद (कांड 10)
यौ त॒ ओष्ठौ॒ ये नासि॑के॒ ये शृङ्गे॒ ये च॒ तेऽक्षि॑णी । आ॒मिक्षां॑ दुह्रतां दा॒त्रे क्षी॒रं स॒र्पिरथो॒ मधु॑ ॥ (१४)
हे शतौदना गौ! तेरे जो दोनों होंठ, तेरी नाक, तेरे जो दोनों सींग तथा जो दोनों आंखें हैं, वे तेरे दानदाता को सदा दही, मधुर दूध एवं घी देते रहें. (१४)
O Shataudana Gau! May your two lips, your nose, your two horns and your two eyes always give curd, sweet milk and ghee to your donor. (14)