हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.1.12

कांड 11 → सूक्त 1 → मंत्र 12 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 1
उ॑पश्व॒से द्रु॒वये॑ सीदता यू॒यं वि वि॑च्यध्वं यज्ञियास॒स्तुषैः॑ । श्रि॒या स॑मा॒नानति॒ सर्वा॑न्त्स्यामाधस्प॒दं द्वि॑ष॒तस्पा॑दयामि ॥ (१२)
हे चावलो! मैं स्थिर एवं उत्तम फल वाले कर्म के निमित्त तुम्हें अधिक बना रहा हूं. इसीलिए तुम सूप में बैठ जाओ. यज्ञ में उपयोग के योग्य तुम भूसी से अलग हो जाओ. हम भी तुम्हारे कारण उत्पन्न संपत्ति से अपने समान जन्म वाले पुरुषों की अपेक्षा श्रेष्ठ हो जाएं और द्वेष करने वाले शत्रुओं को अपने पैरों में गिराएं. (१२)
Oh rice! I am making you more for the sake of a stable and good fruit work. That's why you sit in the soup. You get separated from the husk suitable for use in the yajna. Let us also become superior to the wealth caused by you than men of our same birth and drop the hostile enemies at our feet. (12)