हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.10.4

कांड 11 → सूक्त 10 → मंत्र 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 10
प्रा॑णापा॒नौ चक्षुः॒ श्रोत्र॒मक्षि॑तिश्च॒ क्षिति॑श्च॒ या । व्या॑नोदा॒नौ वाङ्मन॒स्ते वा आकू॑ति॒माव॑हन् ॥ (४)
प्राण और अपान वायु, नयन, कान, क्षीण होने वाली क्रिया शक्ति, क्षय रहित ब्रह्म, व्यान और उदान वायुएं, वाणी और मन ने देवकृत संकल्प को धारण किया. (४)
Prana and Apana Vayu, Nayan, Kan, Emanking Kriya Shakti, Decay-free Brahman, Vyan and Udan Vayus, Speech and Mind possessed devkrit sankalpa. (4)