हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.5.16

कांड 11 → सूक्त 5 → मंत्र 16 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 5
तत॑श्चैनम॒न्याभ्यां॒ प्रप॑दाभ्यां॒ प्राशी॒र्याभ्यां॑ चै॒तं पूर्व॒ ऋष॑यः॒ प्राश्न॑न् । स॒र्पस्त्वा॑ हनिष्य॒तीत्ये॑नमाह । तं वा अ॒हं ना॒र्वाञ्चं॒ न परा॑ञ्चं॒ न प्र॒त्यञ्च॑म् । स॑वि॒तुः प्रप॑दाभ्याम् । ताभ्या॑मेनं॒ प्राशि॑षं॒ ताभ्या॑मेनमजीगमम् । ए॒ष वा ओ॑द॒नः सर्वा॑ङ्गः॒ सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः । सर्वा॑ङ्ग ए॒व सर्व॑परुः॒ सर्व॑तनूः॒ सं भ॑वति॒ य ए॒वं वेद॑ ॥ (१६)
गुरु अपने शिष्य से इस प्रकार कहे-“हे देवदत्त पूर्ववर्ती अनुष्ठानकर्ता ऋषियों ने जिन चरणांशों अर्थात्‌ पंजों की सहायता से ब्रह्मौदन सेवन किया था उससे भिन्न प्रकार से यदि तुमने इस का सेवन किया तो सर्प तुम्हारी मृत्यु कर देगा.” इस के उत्तर के रूप में शिष्य अपने गुरु से कहे — मैंने इस ओदन का सेवन न पराङ्मुख हो कर किया है, न सामने से किया है और न आत्माभिमुख हो कर किया है. मैं ने इसे वहीं पहुंचा दिया, जहां इसे जाना चाहिए था. मैंने सविता देव के प्रपदों अर्थात्‌ अर्थात्‌ पंजों की सहायता से उस का सेवन किया है, यह ओदन समस्त अंगों से युक्त सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला है. जो इस ओदन को उस विधि से सेवन करना जानता है, वही समस्त अंगों वाला, सभी जोड़ों सहित और संपूर्ण शरीर वाला हैं. वह स्वर्ग आदि श्रेष्ठ स्थानों में स्थित होता है. (१६)
The Guru said to his disciple in this way, "O Devdatta, if you consume brahmaudan in a different way than the steps with which the sages had consumed brahmaudan, then the snake will kill you." It has not been done from the front and it is not done from the soul. I delivered it where it should have gone. I have consumed savita dev with the help of her pāpadas i.e. claws, this odan is with all the joints with all the organs and the whole body. He who knows how to consume this odan in that manner is the one with all the organs, with all the joints and the whole body. It is located in the best places of heaven etc. (16)