हरि ॐ

अथर्ववेद (Atharvaved)

अथर्ववेद 11.7.13

कांड 11 → सूक्त 7 → मंत्र 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

अथर्ववेद (कांड 11)

अथर्ववेद: | सूक्त: 7
अ॒ग्नौ सूर्ये॑ च॒न्द्रम॑सि मात॒रिश्व॑न्ब्रह्मचा॒र्यप्सु स॒मिध॒मा द॑धाति । तासा॑म॒र्चींषि॒ पृथ॑ग॒भ्रे च॑रन्ति॒ तासा॒माज्यं॒ पुरु॑षो व॒र्षमापः॑ ॥ (१३)
ब्रह्मचारी अग्नि में, सूर्य में, चंद्रमा में, वायु में और जल में समिधा को धारण करता है. अग्नि आदि की किरणें अंतरिक्ष अर्थात्‌ आकाश में अलग-अलग विचरण करती हैं. वे किरणें गायों में घृत को, पुरुष और स्त्री में संतान को तथा वर्षा में जल को उत्पन्न करती हैं. (१३)
Brahmachari holds samidha in agni, in sun, in moon, in air and in water. The rays of agni etc. travel differently in space i.e. sky. Those rays produce hatred in cows, children in men and women, and water in rain. (13)